Sunday, January 11, 2009

वक़्त के माथे पे

वक़्त के माथे पे हम शिकन देखते हैं
अपने पैरों में जब भी थकन देखते हैं

डूब चला ये सूरज भी अब हौले हौले
उठती सीने में एक चुभन देखते हैं

उठाये हैं जब से मजहबों ने ख़ंज़र
ख़ौफ़ से भरे दीवार ओ सहन देखते हैं

मुद्दत हुई देखा था फूलों को हंसते हुये
अब तो उजड़ा हुआ चमन देखते हैं

किसको दें भला पैग़ामे उल्फ़त अब
दुश्मनी में डूबा हर ज़ेहन देखते हैं

बदलेगा कभी तो ये बिगड़ा निज़ाम
हौसले की नई एक लगन देखते हैं

मौत आती नही निर्मल को किसी दम
गो ज़हर से भरा उसका बदन देखते हैं

2 comments:

  1. उठाये हैं जब से मजहबों ने ख़ंज़र
    ख़ौफ़ से भरे दीवार ओ सहन देखते हैं


    --बहुत गजब!! वाह!!

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