Tuesday, January 24, 2012

अभी तक गांव में

ये सुना है, इक दिवानी है अभी तक गांव में
जो मुझे ही याद करती है अभी तक गांव में

हम जहाँ मिलते रहे थे शाम के साये तले
वो सुहानी शाम ढलती है अभी तक गांव में

सात सागर पार करके दूर तो हम आ गये
पर हमारी जान अटकी है अभी तक गांव में

यूं बदल तो सब गया है अब वहाँ फिर भी मगर
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गांव में

चैन मिलता है वहाँ आराम मिलता है वहाँ
हर ख़ुशी की राह मिलती है अभी तक गांव में

ज़िन्दगी रफ़्तार से चलने लगी है हर तरफ़
फिर भी देखो आस बसती है अभी तक गांव में

बिन हमारे शायरी ग़मगीन है रहने लगी
याद अपनी सबको आती है अभी तक गांव में

वो बिचारा तो जहां की भीड़ में है खो गया
कोई निर्मल को बुलाती है अभी तक गांव में

Friday, December 30, 2011

नया साल

नव-वर्ष की शुभकामनाओं के साथ

साल इक बार फिर से नया हो चला
बाग़ हर ज़िन्दगी का हरा हो चला

था भला या बुरा जो गया है गुज़र
फिर दोबारा नये का नशा हो चला

हर कोई हर किसी से गले मिल रहा
सिलसिला अब ख़ुशी का घना हो चला

तुम जिसे कह रहे थे दुखों का नगर
हर गली में ख़ुशी का पता हो चला

फूल हम दे रहे हैं बधाई के तुझे
जान लो साले नौ अब खरा हो चला


एक बार फिर सबको नये साल की बधाई हो...

Friday, December 23, 2011

शक्तियों शक्ति दो

दिक्कतों से जूझता
तम है गहरा
कुछ न सूझता,
विश्व रंगहीन हो गया
कौन अब
किसी को पूछता,
इस कठिन काल में
कोई एक युक्ति दो
शक्तियों शक्ति दो
शक्ति दो,

विश्वास चरमरा रहा
हौसला भी डगमगा रहा,
बस रहा था मन में जो
दूर हमसे क्यों वो जा रहा,
हृदय से भावनायें मेट कर
मुक्ति दो
शक्तियों शक्ति दो
शक्ति दो

हर तरफ़
नियम का ही जाल है
ज़िन्दगी सवाल पर
सवाल है,
यदि प्रेम से जीये चलो तो
बस कमाल ही
कमाल है,
प्रेम ही रचा हो जिसमें
ऎसी एक पंक्ति दो
शक्तियों शक्ति दो
शक्ति दो...

Wednesday, December 7, 2011

देर न कर फ़ैसला कर

अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित
न्याय-अन्याय, पाप-पुन्य
सत्य-असत्य, दण्ड या माफ़ी
ये सब तू जाने
मैं तो केवल जानूं
उमड़ती भावनायें, उड़ती अभिलाषायें
घुटती तमन्नायें, सुलगती चिन्गारियां
मचलती किलकारियां,
मैं तो केवल जानूं
सुख-दुख, मिलना-बिछड़ना
रिश्ते-नाते, जोड़-घटाव
उतार-चढ़ाव, दोस्ती-दुश्मनी
जीवन-मृत्यु,
मगर हाँ,
मैं ये भी जानूं कि
नीयति की डोर
तेरे हाथ है
निर्णय की चाभी
तेरे पास है,
तो देर न कर
फ़ैसला कर,
आसामी है हाज़िर
रहने दे इसी जेल में
या
निकाल दे बाहिर
देर न कर
फ़ैसला कर
फ़ैसला कर...

Sunday, December 4, 2011

लीला दिखाया न कर

हर घड़ी तू मुझे आजमाया न कर
मैं तो इन्सान हूँ ये भूल जाया न कर

साथ देने का वादा किया तूने तो
राह में ही मुझे छोड़ जाया न कर

ढूँढता मैं तुझे हर जगह हर गली
दे ज़रा सी झलक छुप तो जाया न कर

चल रहा मैं अकेला बहुत देर से
साथ दे दे ज़रा यूं सताया न कर

बेख़बर था बहुत मैं किसी दौर में
याद उस दौर की अब दिलाया न कर

ज़िन्दगी चीज़ है बेरहम आजकल
सपनों से और इसको लुभाया न कर

जब तेरी मौज में डूबता मैं कभी
उस ख़ुशी से मुझे दूर लाया न कर

पास भी तुम नहीं दूर भी तुम नहीं
ऐसी निर्मल को लीला दिखाया न कर

Monday, November 28, 2011

दिले-गुलशन सजा लेते

मेरी दुनिया में आ जाते नई दुनिया बना लेते
अगर तुम साथ होते तो ज़माने को झुका लेते

हवा का रुख़ बदल जाता समय की धार थम जाती
मुहब्बत से सितारों को ज़मीं पे हम बुला लेते

ख़ुशी की बात होती या ग़मों की दास्तां होती
ज़रा तुमसे सुना करते ज़रा अपनी सुना लेते

कभी ख़ामोश हो लेते कभी हम गुनगुना लेते
कभी मदहोश होकर हम तुझे तुमसे चुरा लेते

दीवाने हम हुये रहते दीवारों पर लिखा करते
कभी जो रूठ जाते तुम तभी तुमको मना लेते

जो सपनों से उतर कर तुम हक़ीक़त में चले आते
तो फिर हम भी मुहब्बत से दिले-गुलशन सजा लेते

Friday, November 25, 2011

ख़ुशियाँ

बड़ी मुश्किल से मिलती हैं ज़माने में कभी खुशियाँ
सम्हालो प्यार से इनको ख़ुदा से जो मिली ख़ुशियाँ

कभी तो चाँद बन के ईद का उतरी तेरे आँगन
दिया बन के दिवाली का कभी घर में सजी ख़ुशियाँ

ये माना कि ज़माने को ग़मों ने घेर रक्खा है
ज़रा घेरे से निकलो तो दिखे दर पे खड़ी खुशियाँ

जो मिल-जुल के रहें हम-सब यहाँ इस दौर में अपने
तो ये जानो कि हम-सब की संवारे ज़िन्दगी ख़ुशियाँ

कभी सावन चला आता कभी पतझड़ नज़र आता
जो देखोगे तो हर मौसम के पीछे हैं छुपी ख़ुशियाँ

न शिकवे हों, शिकायत हो किसी से तुमको अब निर्मल
जो तुम अपने में झांकोगे नज़र तब आयेंगी ख़ुशीयाँ