Friday, October 28, 2011

तू सुन मेरा शिकवा गिला

कुछ नहीं सूझे ख़ुदा, तू सुन मेरा शिकवा गिला
कब तलक चलता रहेगा इन ग़मों का सिलसिला

ज़िन्दगी थक हार कर ख़ामोश है रहने लगी
सांस जाने क्यों चले, ये क्यों न रुकता क़ाफ़िला

धर पकड़ होती रही पर हाथ ना आया कभी
मन का पंछी भी ग़ज़ब है जब मिला उड़ता मिला

खुल के हंसने की तमन्ना दिल में घुटती ही रही
पर ज़माना मुझपे हरदम मुस्कुराता ही मिला

सांप चलते ही मिले हैं आस्तीनों में यहाँ
ख़ूब यारों ने दिया है इन वफ़ाओं का सिला

क्या है खोया, क्या है पाया ये समझ ना आ सका
पर जो निकला ज़िन्दगी से वो गया है दिल हिला

ना ही बरसा कोई मौसम छत पे निर्मल की कभी
ना ही चमका कोई तारा ना ही कोई गुल खिला

4 comments:

  1. खुल के हंसने की तमन्ना दिल में घुटती ही रही
    पर ज़माना मुझपे हरदम मुस्कुराता ही मिला

    सांप चलते ही मिले हैं आस्तीनों में यहाँ
    ख़ूब यारों ने दिया है इन वफ़ाओं का सिला

    खूबसूरत गज़ल

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया आप सबका हौसला अफ़ज़ाई के लिये।
    आभारी हूँ...

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