Friday, October 22, 2010

जाने कब तुम आओगे साजन

जाने कब तुम आओगे साजन
अपना रूप दिखाओगे साजन
जाने कब तुम...

नदी गीत की सूख चली है
छन्द की भाषा रूठ चली है
ग़ज़ल को मिलता नहीं रास्ता
नज़्म बिचारी डूब चली है
कब तुम पार लगाओगे साजन
जाने कब तुम...

पल भर का ये साथ चले ना
बहुत दूर से प्यार पले ना
अब आना तो जम कर आना
गर्म हवा से दाल गले ना
कब तक यूं तरसाओगे साजन
जाने कब तुम...

कौन सी मैं तरक़ीब लगाऊँ
राह कौन सी मैं अपनाऊँ
दुर्बल मन को सूझे कुछ ना
तुझको कैसे पास ले आऊँ
कब मुझमें घुल जाओगे साजन
जाने कब तुम...

यूं दिल तेरा कोई सख़्त नहीं
पर पास मेरे भी वक़्त नहीं
सूरज-चाँद बराबर रहते
हम इतने पर चुस्त नहीं
आकर कब बहलाओगे साजन
जाने कब तुम...

तुम आओ तो हम-तुम खेलें
भर तुझको बाहों में ले लें
तेरी नर्म हथेली पर हम
अपने फिर जज़बात उड़ेलें
तब हमको मिल जाओगे साजन
ख़ुश हमको कर जाओगे साजन
जाने कब तुम आओगे साजन...

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर गीत है इसे सुन कर वो जरूर आयेगी। शुभकामनायें।

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  2. तू साजन हो या सजनी,दे दरस परस किसी रजनी।
    तुझ बिन हुए निर्मल भजनी,तेरी याद यूँ बस बजनी॥

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