Thursday, April 23, 2009

अर्चना

रनबीर लिफ़्ट से निकल कर अपने ऑफ़िस की ओर बढ़ चला। धीमे-धीमे क़दमों के साथ ऑफ़िस की तरफ़ जाते हुये, उसे कई लोगों ने विश किया। उसने किसी का जवाब दिया-- किसी का नहीं, चुपचाप अपने दफ़्तर का दरवाज़ा खोला और टेबल पर जाकर बैठ गया। उसके चेहरे से गम्भीरता साफ़ झलक रही थी। कुछ करने के लिये वह उठने ही लगा था कि, अचानक उसके चेहरे के सामने किसी ने घड़ी करते हुये कहा,
"ये ऑफ़िस आने का वक्त है क्या...?"
वह अचकचा गया। मालिक था वह अपनी कम्पनी का। कोई उससे इस क़िस्म का सवाल करे-- इतनी हिमाकत, उसने क्रोध में नज़रें उठा कर सामने देखा।
सामने पच्चीस-छब्बीस साल की ख़ूबसूरत नवयुवती खड़ी थी। रनबीर को अपनी ओर देखते ही फिर बोली,
"जी हाँ.... बोलिये न.... यह कोई ऑफ़िस आने का समय है...? दोपहर का एक बज रहा है और आप हैं कि, अब पधार रहे हैं। थोड़ी ही देर में सबके जाने का टाईम हो जायेगा, सब चले जायेंगे तब आप यहाँ क्या करेंगे?"
"जी.... वो..... मगर....." रनबीर इस अनपेक्षित स्थिति के लिये तैयार नहीं था। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह लड़की कौन है। वह उससे पूछने ही वाला था, कि वह पहले ही बोल पड़ी,
"आप सोच रहे होंगे कि मैं कौन हूँ...? है न, तो ज़्यादा दिमाग़ पर ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं है, मैं स्वयं ही बता देती हूँ.... माईसेल्फ़ अर्चना रस्तोगी, और मैं आपकी नई सेक्रेटरी हूँ।" अर्चना ने अपना हाथ बढ़ाते हुये कहा
"मगर.... मगर...." रनबीर ने उसके बढ़े हाथ पर कोई ध्यान न दिया।
"और हाँ.... कुछ दिन से आपके बिना ही, ये ऑफ़िस चला रही थी, आज आप आ गये हैं तो सब कुछ जान लेंगे। राईट....?"
"मगर यहाँ तो सुनीता हुआ करती थी।" रनबीर जल्दी में बोला, " वह कहाँ है?"
"उसके पति का दूसरे शहर तबादला हो गया, सो उसे काम छोड़ कर जाना पड़ा और उसकी जगह हमारी अप्वाईंटमेंट हो गई, और कुछ....?"
"ओह....हाँ... वो मलहोत्रा कहाँ है?"
"मलहोत्रा सर अपने ऑफ़िस में हैं। उन्होंने बताया था कि आज आप आने वाले हैं, और जब आप आ जायें तो आपको ये बता दिया जाये, कि आप उनके दफ़्तर में जाकर उनसे मिल सकते हैं।" अर्चना ने बड़ी हलीमी से उत्तर दिया।
इस अप्रत्याशित स्थिति से रनबीर बौखलाया तो था पर अब, काफ़ी हद तक वह संभल चुका था। वह मलहोत्रा के ऑफ़िस की ओर चल पड़ा। वह समझ चुका था कि इस अर्चना रस्तोगी को मलहोत्रा ने अप्वाईंट किया होगा परन्तु उसने उससे, इस बारे में कोई ज़िक्र नहीं किया था। बीमारी की वजह से वह कई हफ़्तों से दफ़्तर नहीं आ सका था। दफ़्तर में होने वाली हर कारगुज़ारी की रिपोर्ट मलहोत्रा उसे दिया करता था मगर उसने अर्चना वाली बात उसे क्यों नहीं बताई? आख़िरकार, मलहोत्रा उसका बिज़निस पार्टनर था। हर तरह के लाभ-हानि के दोनों समान भागीदार थे, फिर उसने अर्चना वाली बात उससे क्यों छुपाई-- यह बात उसके पल्ले नहीं पड़ रही थी। यही सोचते-सोचते वह मलहोत्रा के दफ़्तर तक जा पहुँचा।
मलहोत्रा अपने ऑफ़िस में किसी पार्टी के साथ विचार-विमर्श में मशरूफ़ था। उसने रनबीर को देखा, और एक कोने में पड़े सोफ़े पर बैठ जाने का इशारा किया। रनबीर ख़ामोशी से सोफ़े पर जा बैठा और उनकी गुफ़्तगू सुनने का प्रयास करने लगा, परन्तु उसका मस्तिष्क तो कहीं और ही घूम रहा था।
रनबीर और मलहोत्रा को ‘हिमालया ग्रुप ऑफ़ इण्डस्ट्रीज़’ नामक इस कम्पनी को चलाते हुये क़रीब तीस साल हो चुके थे। बहुत थोड़ी-सी लागत से शुरू की गई कम्पनी अब एक विशाल एम्पायर में तब्दील हो चुकी थी। दोनों दोस्तों ने जब इस कारोबार का उदघाटन किया था तो उन्हें स्वप्न में भी ग़ुमान नहीं था कि इस कारोबार और उनकी दोस्ती में ऐसा पक्का तालमेल बैठेगा कि जिसकी मिसाल ढूँढने से नहीं मिलेगी। समय ने, चलते-चलते दोनों को बुढ़ापे की दहलीज़ पर तो ला खड़ा किया,मगर उनकी दोस्ती और कारोबार में कोई अन्तर न आया। रनबीर अपने दोस्त मलहोत्रा की सूझ-बूझ और दूर-अंदेशी का क़ायल था। पार्टियों से डील करने में उसका कोई सानी नहीं था। बड़े-बड़े लोगों से मेल-जोल बढ़ा कर अपनी कम्पनी का काम निकालने में वह माहिर था। इसके विपरीत रनबीर कुछ धीर-गम्भीर व्यक्तित्व का मालिक था और अपने इसी स्वभाव और क़ाबलियत के कारण वह कम्पनी का सारा काम पूरी तन्मयता और दक्षता से चलाता था।
"हाँ तो जनाब.... मिल गई फ़ुरसत बीमारी से...?" मलहोत्रा ने रनबीर की ओर आते हुये कहा। पार्टी जा चुकी थी और अब वहाँ उन दोनों के सिवा कोई नहीं था।
" हूँ.... मगर ये अर्चना का क्या किस्सा है...तुमने बताया नहीं?" रनबीर ने पूछा
"कैसे बताता? पिछले साल भर से तुम अपनी मानसिक परेशानियों की वजह से कम्पनी के काम में ध्यान नहीं दे पा रहे थे, मैं...’
"मगर तुम तो मेरा सारा दुख समझते हो, फिर भी ऐसा कह रहे हो?"
"हाँ... मैं जानता हूँ कि पूजा का ग़म तुम्हें अंदर-ही-अंदर खाये जा रहा है मगर मेरे दोस्त, ऐसा कब-तक चलेगा... संभालो अपने आपको मेरे भाई..." मलहोत्रा ने भावुकता से कहा।
"मैं कोशिश तो कर रहा हूँ न!" रनबीर ने कहा
"मैं जानता हूँ, ये अच्छी बात है, परन्तु काम भी तो चलाना पड़ता है, जब तुम नहीं आ पा रहे थे, तो अंदर और बाहर का सारा बोझ मुझ पर आ पड़ा था, ऊपर से तुम्हारी सेक्रेटरी सुनीता भी काम छोड़ गई तो थक-हार-कर मुझे अर्चना को अप्वाईंट करना पड़ा।"
"वो तो ठीक है, पर तुम्हें कोई और नहीं मिली इस अर्चना के अलावा...."
"ओ कम ऑन रनबीर.... इसने बिज़निस मैनेजमेंट का कोर्स किया है और थोड़ा-बहुत तजुर्बा भी है मुझे ये कम्पनी के लिये हर तरह से उपयुक्त लगी, सो इसे मैंने रख लिया। कुछ दिन काम देखा, तो वह भी अच्छा लगा... क्यों? क्या तुम्हें अच्छी नहीं लगी...?" मलहोत्रा ने रनबीर की आँखों में झांका।
"अभी कुछ कह नहीं सकता.... परन्तु बातें बहुत करती है....।" रनबीर को अपने साथ अर्चना का किया व्यवहार स्मरण हो आया।
"मगर, ऑफ़िस का तमाम स्टॉफ़ अर्चना से बेहद ख़ुश है। कुछ ही हफ़्तों में इसने अपनी क़ाबलियत और व्यवहार से सबका मन जीत लिया है। तुम्हारे ग़म की वजह से ऑफ़िस वाले भी बुझे-बुझे से रहते थे। अर्चना के आने से, माहौल कुछ बदला है। मैं चाहता था कि तुम जब आओ तो तुम्हें कुछ अच्छा वातावरण मिले। ख़ैर, मुझे तो वह अच्छी लगी, आशा है, तुम्हें भी अच्छी लगने लगेगी।"
"वेल... देखेंगे... अब क्या प्रोग्राम है?"
"मैं तो लंच के लिये बाहर निकलने वाला था, अब तुम आ गये हो तो तुम भी साथ चलो... बहुत दिन बाद साथ बैठेंगे.... ठीक है न!"
"हाँ... हाँ... चलो.."
मलहोत्रा ने सही कहा था। कम्पनी का माहौल अब काफ़ी बदल चुका था। पिछले साल भर से रनबीर कुछ व्यक्तिगत-कारणवश ऑफ़िस से लगभग दूर ही रहा था। अगर कभी आता भी था तो चिड़चिड़ा और ग़ुस्से से भरा हुआ। ऑफ़िस के लोग उसके इस व्यवहार से परेशान तो थे ही, मगर उसके ग़म से दुखी भी थे। कोई उसकी कही बात का बुरा नहीं मानता था लेकिन ऐसे माहौल का असर काम पर अवश्य पड़ रहा था। पूजा के दुख ने रनबीर को झकझोर कर रख दिया था। अब जीवन उसके लिये ज़रा भी रुचिकर नहीं रह गया था।
"क्या ख़्याल है...? आज शाम मेरे घर चलते हैं। सावित्री भी तुम्हें याद कर रही थी रात का खाना वहीं खायेंगे।" मलहोत्रा ने खाना खाते हुये रनबीर से पूछा।
"आज नहीं ...फिर कभी... भाभी से कहना, मैं जल्दी ही उधर चक्कर लगाऊँगा। अभी तो मैं खाने के बाद सीधा घर ही जाऊंगा...।"
"और घर जाकर , शराब लेकर बैठ जाओगे, क्यों है न?"
"नहीं यार.... अब तो बहुत कम कर दी है।"
"कोई कम-वम नहीं की है, मुझे सब पता है। माना कि, तुम्हारे साथ बड़ा गम्भीर हादसा हुआ है, हम-सब तुम्हारे ग़म में साथ हैं पर यार, दुख से उबरने के लिये प्रयत्न तो तुझे ही करना पड़ेगा न!"
"ओ. के.... ओ. के.... नो लैक्चर प्लीज़.... अच्छा मैं चलता हूँ...." कहते हुये रनबीर उठ खड़ा हुआ।
"कल ऑफ़िस आओगे न?"
"हाँ यार.... आ जाऊँगा...."
इतना कह टैक्सी ले रनबीर घर चल पड़ा। मलहोत्रा का अनुमान बिल्कुल सही था। घर पहुँच कर रनबीर ने बोतल निकाली, और पीने बैठ गया। वह रात देर तक पीता रहा। इन्सान ग़म की गहराईयों से निकलने के लिये शराब का सहारा लेता है, मगर किसी गम्भीर ग़म से उबरना, क्या इतना आसान है?
दूसरी सुबह, रनबीर जब ऑफ़िस पहुँचा तो फिर दोपहर हो चुकी थी। वह जैसे ही टेबल पर बैठा, तो सामने लगे फ़ाईलों का ढेर देख चौंक उठा।
"यह क्या......" उसके मुंह से निकला,
"यह आपका पेंडिग पड़ा हुआ काम है जो आपने समाप्त नहीं किया था, और अब आपने यह करना है..." सामने अर्चना खड़ी मुस्कुरा रही थी।
"मेरी मेज़ पर फ़ाईलों का ढेर लगाने की तुम्हें किसने इजाज़त दी?" वह भड़क उठा
"यह आपका ही काम है और आपको ही करना चाहिये, किसी और की टेबल पर...."
"शट-अप..." वह ग़ुस्से में उबल पड़ा, "यह फ़ाईलें उठाओ और निकल जाओ यहाँ से..."
"एक बात तो बताईये, आप काम से इतना घबराते क्यों हैं? मेरी मानिये, इतना आलस अच्छा नहीं होता....और...."
"आई से यू शट-अप..." वह एकदम से चीख़ते हुये उठ खड़ा हुआ, "तुम बाहर जाती हो कि नहीं...?"
अर्चना ने चुपचाप फ़ाईलें उठाई और बाहर निकलने ही लगी थी कि, वह फिर ज़ोर से बोला,
"और सुनो..... अपनी नसीहतें अपने पास ही रखा करो.... जितनी तुम्हारी उम्र नहीं है उससे कहीं ज़्यादा इस कम्पनी की उम्र है। आयन्दा से, अपने दायरे में रहने की आदत डाल लो.... समझी.... वर्ना...."
अर्चना ने आँखों में तैरते आँसुओं को छुपाया और ख़ामोशी से बाहर निकल गई।
उसके जाते ही रनबीर धम्म से कुर्सी पर बैठ गया। उसकी सांस फूल रही थी। उसने ज़ेब से गोलियों की शीशी निकाली, एक-दो गोलियां मुंह में डालीं और आँखे बन्द कर लीं।
मलहोत्रा उस वक्त बाहर किसी पार्टी से मिलने गया हुआ था। क़रीब तीन बजे जब वह वापस आया तो उसे सारी बात का पता चला। उसे बहुत दुख हुआ। वह जानता था कि रनबीर दिल का बुरा नहीं है। उसे बस अपने ग़म से उबरने के लिये वक्त चाहिये। उसने अर्चना को बुलाया और उसे बड़े प्यार से समझाया। वह तो नौकरी छोड़ कर जाने को तैयार थी परन्तु उसके समझाने पर रुक गई।
अर्चना को समझाने के बाद मलहोत्रा रनबीर के दफ़्तर में गया और उसे देखते ही क्रोध भरे स्वर में बोला,
"रनबीर ये सब क्या हो रहा है? आख़िर तुम्हें, अर्चना से क्या ऐलर्जी है? क्यों तुम उससे इतनी ख़ार खाते हो? और तो और, तुम अपनी कम्पनी की सारी मान-मर्यादा भूल गये हो!"
रनबीर कुछ न बोला, मलहोत्रा ने फिर आगे कहा,
"देखो रनबीर, इन्सान का एक अवगुण उसके बहुत सारे गुणों को निग़ल लेता है। तुम्हारे क्रोध और हक़ जताने की आदत से मैं तो भलीभांति परिचित हूँ, मगर कम-से-कम अर्चना के साथ इतनी ज़्यादती तो न करो!"
"तुम नहीं जानते मलहोत्रा, वह बहुत ज़्यादा हॉवी होने की कोशिश करती है। ऐसा लगने लगता है कि वह यहां की मालकिन हो, और हम सब नौकर-चाकर।"
"नहीं.... ऐसी बात नहीं है रनबीर, तुमने उन फ़ाईलों को तो खोल कर देखा ही नहीं, कई महीने का तुम्हारा अधूरा काम, उसने पिछले कुछ ही दिनों में पूरा किया है। इस काम के लिये उसने समय की कोई परवाह नहीं की, और आज जब सारा काम समाप्त करके फ़ाईलें तुम्हारे दस्तख़त के लिये टेबल पर रखीं, तो शाबाशी देने की बजाय तुमने उसके साथ जो सुलूक किया उससे उसे कितना दुख हुआ होगा, इसका अंदाज़ा है तुम्हें....?"
"क्या....?" रनबीर के मुंह से निकला,
"हाँ.... जहाँ तुम्हें उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिये था, वहाँ तुमने उसका अपमान कर दिया। वह तो काम छोड़ कर जा रही थी, मैंने ही समझा-बुझा कर रोक लिया है। अब ये तुम्हारे हाथ में है। तुम उसे रखना चाहते हो तो रखो, निकालना चाहते हो तो निकाल दो, मैं कोई दख़ल नहीं दूंगा...।" मल्होत्रा रनबीर से पूरी तरह ख़फ़ा था।
"ओह... आई ऐम सॉरी...." रनबीर का लेहज़ा नर्म हो गया।
"सॉरी मु्झे नहीं.... अर्चना से कहो तो बेहतर है।"
कहने के साथ ही मल्होत्रा उठा और अपने दफ़्तर की ओर बढ़ गया।
रनबीर बहुत देर तक ख़ामोश बैठा रहा। वह इसी उधेड़बुन में था, कि अर्चना को बुलाये तो किस तरह। अपने व्यवहार पर उसे शर्मिन्दगी तो थी ही, परन्तु उसका अहम भी आड़े आ रहा था। अन्तत: उसने अर्चना को बुला भेजा।
"यस सर.... आपने मुझे बुलाया?" अर्चना अंदर आकर पूरे मान और गम्भीरता से बोली,
"हाँ... वो फ़ाईलें दोबारा लाओ,"
कहते हुये रनबीर ने ज्योंहि सर उठा कर सामने अर्चना को देखा, तो देखता ही रह गया। उसकी पलकें रोने की वजह से सूजी हुई थीं। चेहरे से उदासी झलक रही थी। रनबीर को उसमें पूजा की छवि तैरती नज़र आई। ऐसा उसे क्यों लगा -- वह ख़ुद नहीं समझ पाया।
अर्चना बाहर गई और फ़ाईलें दोबारा लाकर टेबल पर रख दीं।
"बैठो...." रनबीर बोला, उसकी समझ में नहीं आ रहा था, कि बात कैसे शुरू करे?
"बात दरअसल यह है......" फ़ाईलों पर नज़र दौड़ाते हुये उसने कहना शुरू किया, " कि मैं.... मैं... तुमसे वो सब नहीं कहना चाहता था जो मैं कह बैठा, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिये था.... आई ऐम सॉरी....."
"कोई बात नहीं सर, ग़लती मेरी ही थी कि, मैं यह भूल गई थी कि मैं एक नौकर हूँ और आप एक मालिक....।"
"अब कह दिया न सॉरी.....और कितनी बार कहना पड़ेगा," रनबीर फिर कुछ उत्तेजित हुआ\
"मैंने भी तो कह दिया न, कि कोई बात नहीं...." अर्चना के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी, "आप सारी फ़ाईलों पर साईन कीजिये, मुझे और भी काम करने हैं।"
अर्चना फ़ाईलें लेकर बाहर गई, तो रनबीर ने स्वयं को काफी हल्का महसूस किया। वह उठ कर मल्होत्रा के दफ़्तर गया और उससे बोला,
"मलहोत्रा, शाम हो चली है, कॉफ़ी पीने चलें?"
"श्योर... श्योर.... चलो," मल्होत्रा ने जब उसके चेहरे पर ख़ुशी देखी, तो उसे बहुत अच्छा लगा। उसने रनबीर से पूछा, " तुम कहो तो, अर्चना को भी साथ ले लें?"
"जैसी तेरी इच्छा..."
कहते हुये जब रनबीर अपने दफ़्तर की ओर जा रहा था, तो उसने देखा कि अर्चना ख़ुशी-ख़ुशी इधर-उधर आ-जा रही है। उसकी चंचलता वापस आ चुकी थी। रनबीर को बहुत तसल्ली महसूस हुई।
कॉफ़ी पीते-पीते रनबीर और अर्चना के बीच की बची-खुची कड़ुवाहट लगभग समाप्त हो चुकी थी। तीनों ने शाम का भरपूर आनन्द लिया। रात को वापस घर जाते हुये, रनबीर स्वयं को बड़ा शान्त और आनन्दित महसूस कर रहा था। आज बहुत दिनों के बाद उसने घर जाकर, सिर्फ़ एक-दो पैग ही लगाये और सोने चला गया।
इस तरह रनबीर का अस्त-व्यस्त जीवन व्यवस्थित होने लगा। अर्चना ने ऑफ़िस से घर तक का माहौल बदल कर रख दिया। मलहोत्रा और उसकी पत्नी, अर्चना से बेहद ख़ुश थे। उनके घर पर, हर दूसरे-तीसरे दिन कभी खाने पर, तो कभी कॉफ़ी के लिये बैठकें होने लगीं। अर्चना के प्रति, रनबीर के दिल में एक क़िस्म का मोह जाग उठा। जीवन के प्रति उसका रवैया फिर से आशावादी हो चला। अब उसके जीवन में कम्पनी, मलहोत्रा परिवार और अर्चना बस, इसके अलावा और कुछ नहीं था।
समय चलता रहा। दिन महीनों में परिवर्तित होते रहे। क़रीब सात- आठ महीने गुज़रने के बाद एक दिन अचानक, रनबीर के दफ़्तर में आकर अर्चना बोली,
"आज शाम, आप घर पर ही रहना, मैं आ रही हूँ, साथ ही मल्होत्रा सर भी आ रहे हैं। एक महत्वपूर्ण विषय पर आपसे बात करनी है।"
"महत्वपूर्ण विषय...? अभी ही कर लो... शाम तक कौन इंतज़ार करे?" रनबीर ने कहा।
"नहीं..... नहीं..... वह बात यहाँ करने वाली नहीं... शाम को ही करेंगे.... और हाँ ध्यान रहे... नो ड्रिंक्स टिल वी कम... ओ. के.?"
"ओ. के. बाबा... अब तो ख़ुश... अब चलो यहाँ से, मुझे और भी काम करने हैं।"
संध्या समय रनबीर घर पहुँच कर उनका इंतज़ार करने लगा। क़्ररीब सात बजे मलहोत्रा अपनी पत्नी समेत पहुँच गया। तीनों बैठ कर बातें करने लगे। रनबीर ने मलहोत्रा से जब पूछा, कि अर्चना किस विषय पर बात करना चाहती है, तो उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। मलहोत्रा ने भी रनबीर को आजमाने के लिये व्हिस्की लेने का आग्रह किया तो रनबीर ने-- पहले अर्चना को आने दो--कह कर मना कर दिया।
साढ़े सात बज रहे थे जब अर्चना ने कमरे में प्रवेश किया। उसके साथ एक नौजवान भी था। रनबीर थोड़ा चौंका, क्योंकि उसने उस युवक को पहले कभी नहीं देखा था।
"सॉरी, हमें आने में ज़रा देर हो गई।" अर्चना आते ही बोली, "कुछ हम लेट चले थे, कुछ रास्ते में ट्रैफ़िक ने लेट कर दिया..."
"कोई बात नहीं.... मगर..." कहते हुये रनबीर ने उस युवक की ओर सवालिया नज़रों से देखा।
"इनसे मिलिये... ये मि. विकास हैं और विकास...! ये मि. रनबीर, और ये मि. मलहोत्रा हैं जिनके बारे में मैंने तुम्हें बताया था। यूं कहने को तो ये मेरे एम्पलॉयर हैं मगर, इनके अलावा इस शहर में मेरा और कोई नहीं है।" अर्चना ने ज़रा गम्भीरता से कहा।
"पर.... ये है कौन...?" रनबीर से न रहा गया।
"ये मेरे मंगेतर हैं, और अगले ही हफ़्ते हम शादी कर रहे हैं..."
"क्या......? तुमने पहले क्यों नहीं बताया?" रनबीर बुरी तरह चौंका।
"कैसे बताती...? अभी पिछले ही हफ़्ते तो, ये अमेरिका से आया है...। देखो... ग़ुस्सा मत करना.... अब बता दिया न...!"
"अब क्या ख़ाक बता दिया.... सब कुछ होने के बाद बताया तो क्या बताया, शादी भी हो जाने देती तो ही बताती.... और न भी बताती तो क्या फ़र्क़ पड़ जाता..." रनबीर पूरी तरह बेक़ाबू सा हो उठा।
"कोई बात नहीं रनबीर, धीरज रखो....," मलहोत्रा ने आगे आ कर हस्तक्षेप करते हुये कहा, " तुम पहले अर्चना की बात शान्ति से सुन तो लो..."
"क्या सुन लो.....? तू भी इनके साथ मिला है क्या...? अगर तुझे इस बात का पहले से पता था, तो तूने मुझे क्यों नहीं बताया...?"
"अरे भई.... मुझे भी आज ही पता चला है, क्या करता, बच्चों के साथ तो समझौता करना ही पड़ता है। तू तो जानता ही है कि, मैंने पहले भी समझौते किये हैं... यार छोड़ न...! अब तो विरोध करने की हिम्मत भी नहीं रह गई है..."
मलहोत्रा सही था। उसने बहुत समझौते किये थे। उसके दोनों बच्चे उसकी मर्ज़ी के बिना, उससे दूर अमेरिका जाकर बस गये थे। इस बात को लेकर वह अंदर-ही-अंदर बहुत दुखी रहता था। पहले तो बच्चे अक्सर फोन करते रहते थे मगर अब तो कभी-कभार ही फोन आता था। रनबीर का घर तो वैसे ही उजड़ा हुआ था। कभी-कभी बाहर से मालामाल दिखने वाले लोग, अंदर से कितने खोखले होते हैं, इस बात का अंदाज़ा रनबीर और मलहोत्रा को देख कर आसानी से लगाया जा सकता था।
"तुम करो समझौता, मैं तो नहीं करूंगा.... अगर इस लड़की को इतना सलीका नहीं, कि अपने इतने बड़े फ़ैसले में हमें शामिल करना चाहिये तो बेशक... ये जाये जहन्नुम में..." रनबीर ने ऊँचे स्वर में कहा।
"अब तुम अर्चना के साथ भी वही सुलूक कर रहे हो, जो तुमने कभी पूजा के साथ किया था। मुझे कई बार ख़्याल आता है कि तुम्हारी ज़िद और क्रोध की वजह से ही पूजा की जान गई। तुम स्वयं हत्यारे हो अपनी बेटी के रनबीर...।" मल्होत्रा भी तैश में बोले जा रहा था।
"क्या बकते हो तुम.... मैंने तो केवल उसे किसी ग़ैर-धर्म वाले के साथ शादी करने से मना किया था..."
यह सच था। रनबीर की बेटी पूजा किसी ग़ैर-धर्म वाले के साथ प्रीत लगा बैठी थी, जिसे रनबीर स्वीकार नहीं कर पाया। वह उसकी शादी किसी अपनी ज़ाति-धर्म में ही धूम-धाम से करना चाहता था। उसकी पत्नी बहुत पहले ही पूजा को उसकी गोद में छोड़ कर परलोक सिधार चुकी थी। उसके बाद रनबीर ने अपना सारा ध्यान और प्यार पूजा पर उंडेल दिया था। पूजा की ख़ातिर उसने दूसरी शादी नहीं की। अगर कहीं वह ग़लत था तो सिर्फ़ इस बात पर कि, पूजा पर वह हद से ज़्यादा अपना अधिकार समझने लग गया था। इसलिये जब पूजा ने जवानी की दहलीज़ पर पांव रखते ही किसी ग़ैर-धर्म वाले से शादी की इच्छा जाहिर की तो वह आपे से बाहर हो गया, और तड़ातड़ कई तमाचे पूजा की गालों पर रसीद किये और साथ ही बड़े कठोर शब्दों में शादी से एक-तरफा इन्कार कर दिया। पूजा नर्वस और रोहांसी होकर वहाँ से भाग निकली। रास्ते में कार चलाते वक्त वह इस क़दर बदहवास और घबराई हुई थी, कि कब उसकी कार सड़क के दूसरी ओर से आते हुये ट्रक से टकराई, उसे पता भी न चल सका।
पूजा को लाख कोशिशों के बावजूद बचाया न जा सका। रनबीर की पत्नी तो पहले ही उसे छोड़ कर जा चुकी थी, जब पूजा भी उसे छोड़ कर चली गई तो वह बिल्कुल ही तन्हा और मायूस हो गया। दुखों की मार से वह निराश रहने लगा। हताशा के इस दौर ने उसे शराब का आदी और चिडचिड़ा बना दिया। और जब उसे वर्षों-बाद अर्चना में पूजा की छवि दिखाई दी, तो उसी मोह के वशीभूत होकर वह अर्चना पर भी वैसा ही अधिकार समझ बैठा। कभी-कभी ज़िन्दगी के इम्तिहान भी बड़े अजीब होते हैं।
"तुमने मना नहीं, उस पर हद से ज़्यादा दबाव डाल दिया था, जिसे वह मासूम जान बर्दाश्त न कर सकी और अपनी जान गंवा बैठी।"
रनबीर कुछ न बोल पाया। मलहोत्रा ने आगे कहा,
"अब इस अर्चना की ओर देखो, इसने बहुत साल पहले दिल्ली में हुये दंगों में अपने मां-बाप को खो दिया था, मगर तुमने कभी इसे उदास और चिड़चिड़े रूप में देखा है? नहीं न, यह बेचारी भी तो दुखी है। हमें यह अपना समझती है, और खास कर तुममें अपने पिता की छवि पाती है तो तुम इस पर फिर अनुचित दबाव क्यों डाल रहे हो? यार रनबीर, समझा करो... जायदाद और इन्सान में बड़ा फ़र्क होता है।"
रनबीर फिर कुछ न बोला, चुपचाप उठ कर खिड़की के क़रीब चला गया। मलहोत्रा रुका नहीं, कहता ही रहा,
"रनबीर, आज अर्चना के रूप में भगवान ने जब तुम्हारी पूजा को वापस किया है तो तुम क्यों फिर वही कहानी दुहरा रहे हो? देखो मेरे दोस्त, बेटियां सारी ज़िन्दगी साथ रहने के लिये नहीं होती हैं। एक न एक दिन तो उन्हें जाना ही होता है और हमें सीने पर पत्थर रख कर उन्हें विदा करना पड़ता है। अच्छा है, यदि तुम पूजा को विदा नहीं कर सके, तो कम-से-कम अर्चना को तो बख़ुशी विदा करो...." इतना कह कर मलहोत्रा ख़ामोश होकर बैठ गया। यूं लगा कि, वह थक सा गया था।
रनबीर चुपचाप खिड़की के बाहर देखता रहा। एक तरफ़ बीती बातों ने उसके सीने में दर्द जगा रखा था, तो दूसरी तरफ़ अर्चना से बिछड़ने का ग़म भी उससे सहन नहीं हो पा रहा था। उसकी आँखों में आँसू झलक रहे थे। बाहर आस्मान की ओर देखते हुये उसे पूजा का मासूम चेहरा याद आया। उसके कानों में मलहोत्रा के शब्द दोबारा गूंज उठे,
"बेटियां सारी ज़िन्दगी साथ रहने के लिये नहीं होती हैं, एक-न-एक दिन तो उन्हें जाना ही होता है। उनकी अपनी एक दुनिया होती है, जो उनका इंतज़ार कर रही होती है।"
उसने मुड़ कर अर्चना की तरफ़ देखा। वह उदास थी। शायद उसके व्यवहार के कारण। वह तो उसे अपने दिल में पिता का स्थान दे चुकी थी। विकास को साथ लेकर उससे आशीर्वाद लेने आई थी, फिर वह क्यों इतना कठोर हो गया? क्यों....क्यों...
यही सोचते-सोचते रनबीर, आहिस्ता-आहिस्ता अर्चना के क़रीब आया और उसके सिर पर अपना हाथ रख, उसे अपने सीने से लगा लिया.....

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3 comments:

  1. निर्मल जी अच्छी कहानी है। मानवीय रिश्ते केवल खून के नहीं होते बल्कि प्रेम और संवेदना के होते हैं।
    अच्छी कहानी के लिए बधाई !

    सुमन कुमार घई

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