Friday, September 23, 2011

न जाने क्यों

न जाने क्यों
आज भी
उम्र के इस मुक़ाम पर
उसके होने का अहसास
मन से बिसरा नहीं है,
वो सुगंधित पल
जब उसका हाथ
मेरे हाथ में था
आज भी
मेरे अंदर जीवित हैं,
हालाँकि
हाथ बहुत पहले ही
छूट गया था
वक़्त बहुत पहले ही
रूठ गया था,
मगर
उस पकड़ का
नर्म अहसास
आज भी
मेरी उंगलियों की
हरकत में है
मेरे लहू की रफ़्तार
मेरे दिल की धड़कन में है,
न जाने क्यों
भूलना चाहते हुये भी
कुछ नहीं भूल पाया मैं
छोड़ना चाहते हुये भी
कुछ नहीं छोड़ पाया मैं
न जाने क्यों
न जाने क्यों...

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