ख़ुद को न हमसे छुपाया कीजिये
हमको इशारों से बुलाया कीजिये
दिल ये हमारा घर है आपका
अपने घर में आया जाया कीजिये
ये प्यार तो ख़ुदा की है इबादत
इस क़दर भी न शरमाया कीजिये
हया के दायरे से निकल भी आयें
यूं हमको न तरसाया कीजिये
इतना भी सिमटना ठीक नही है
कभी कभी तो मुस्कुराया कीजिये
महफ़िले ग़ैर में क्यूं हैं जाते आप
दिल हमारा न यूं जलाया कीजिये
ख़्वाब तो ख़्वाब है टूट जाता है
मत ख़्वाबों से बहलाया कीजिय़े
धड़कनों में मेरी नाम है आपका
कभी अपनी भी सुनाया कीजिये
नासूर न बन जायें ज़ख़्म ये कहीं
ज़ख़्मों को मेरे सहलाया कीजिये
नफ़रतों का दौर है हर तरफ़
सबक़ प्यार का सिखाया कीजिये
चाहते हैं अगर प्यार ही प्यार
दिल निर्मल का सजाया कीजिये
Tuesday, January 20, 2009
वो शख़्स बड़ा दीवाना निकला
जिसको सुनने सारा ज़माना निकला
वो मेरी मुहब्बत का फ़साना निकला
धड़कता था जो सबके दिलों में हरदम
मेरे ही लबों का एक तराना निकला
आते ही दिया पैग़ाम चले जाने का
ये मुझको जुदा करने का बहाना निकला
क़त्ल हुआ मेरा, शोर न मचा क्योंकि
मेरा क़ातिल मेरा यार पुराना निकला
औरों को ख़ुशी दे, ख़ुद ग़म ही समेटे था
इस दौर में वो शख़्स बड़ा दीवाना निकला
ग़म जो मिले निर्मल से तो अचानक बोले
यार, तुमसे तो बरसों का याराना निकला
वो मेरी मुहब्बत का फ़साना निकला
धड़कता था जो सबके दिलों में हरदम
मेरे ही लबों का एक तराना निकला
आते ही दिया पैग़ाम चले जाने का
ये मुझको जुदा करने का बहाना निकला
क़त्ल हुआ मेरा, शोर न मचा क्योंकि
मेरा क़ातिल मेरा यार पुराना निकला
औरों को ख़ुशी दे, ख़ुद ग़म ही समेटे था
इस दौर में वो शख़्स बड़ा दीवाना निकला
ग़म जो मिले निर्मल से तो अचानक बोले
यार, तुमसे तो बरसों का याराना निकला
Friday, January 16, 2009
आज़ादी
सुबह-सवेरे नहा धोकर मैं ज्योंहि अपने आफिस में पहुँचा तो कुछ लिखने को मन हुआ। लिखने का मेरा दफ़्तर मेरे घर पर ही स्थित है। हर तरह की सुविधा से सम्पूर्ण होने पर भी लिखने के मामले में मैं ज़रा दकियानूसी हूँ। कहने का मतलब है कि पहले मैं कलम से कागज़ पर लिखता हूँ पश्चात उसे कम्प्यूटर पर टाईप करता हूँ। हाथ से लिखकर मुझे अत्यधिक संतुष्टि मिलती है। एक बात और मैं ज़्यादातर सुबह-सुबह ही लिखने को तरजीह देता हूँ। इसके कई कारण हैं। एक तो मन सुबह-सुबह काफ़ी हद तक एकाग्र होता है जिससे नयापन तेज़ी से सूझता है। दूसरा बाहरी हस्तक्षेप का अंदेशा भी बहुत कम होता है। उत्तम लेखिनी के लिये सुबह का समय मुझे बहुत उपयुक्त लगता है।
ख़ैर, काफ़ी सोच विचार के बाद अपने पुराने लिखे कागज़ों को एकत्रित कर एक ओर रखा और नये कागज़ सामने रखकर ज्योंहि कलम उठाकर उससे लिखने का प्रयास किया तो कलम अटकने लगी। उसके अटकने का कारण मुझे समझ में न आया। काफ़ी प्रयत्न करने पर भी जब वह टस से मस न हुई तो मैं खिन्न हो उठा और चलने के लिये कलम पर अधिक से अधिक दबाव डालने लगा। मेरा अत्यधिक दबाव देखकर यकायक कलम तड़प उठी और क्रोध से तमतमाते हुये मुझ पर उबल पड़ी।
"आख़िर क्या चाहते हो तुम मुझसे?" वह बिफरी ,"क्यों सताते रहते हो इस तरह मुझे आ आकर। हर सुबह मेरी गर्दन पकड़ कर अपनी मनमानी करना शुरू कर देते हो, आख़िर क्यों"
"ओह...हो.. ये क्या हो गया है आज तुम्हें" मैं बोला " क्यों इस तरह भड़क रही हो, मैने तुम्हे पहले कभी इस तरह अपने कर्तव्य से आंखे चुराते हुये नही देखा"
"कर्तव्य ? कौन से कर्तव्य की बात करते हो तुम" वह भड़क उठी "अगर तुम इमानदारी से सत्य लिखने को कर्तव्य मानते हो तो यह तुमने भी देखा है कि जब भी मैं ऐसा करने का प्रयास करती हूँ तो मेरे पैरों में बेड़ियां डालने की मुहिम शुरू हो जाती है और फिर ज्योंहि मेरे क़दम थमने लगते हैं तुम आकर फिर कर्तव्यपरायणता की दुहाई देने लग जाते हो।"
"यह तो तुम भी जानती हो प्रिये" मैने उसे समझाते हुये कहा, "जब भी दुनिया में कोई सत्य को अपनाता है और ईमान की राह पर चलने का प्रण करता है तो उसकी राह में अड़चनें तो आती ही हैं। फिर यह भी तो उचित नही कि सच्चाई से मुंह मोड़ो और जो होता है उसे होने दो"
"जो होता है उसे होने दो" उसने मेरी बात को व्यंग से दुहराते हुये कहा, "क्या तुम नही जानते कि इस दौर में ऐसा ही चाहा जाता है। हां में हां मिलाने की परिपाटी चली हुई है। राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि हर कोई चाहता है बस उसके गुण्गान किये जाओ। चमचागीरी और चापलूसी का ढंग अपनाये जाओ। उनके स्याह-सफ़ेद और घपले-घोटाले का हुबहू समर्थन किये जाओ और अगर ऐसा न कर सको तो अंजाम भुगतने के लिये तैयार हो जाओ।"
"तुम्हे इतनी नाकारत्मक सोच नही रखनी चाहिये" मैं लगभग खीजते हुये बोला, "बल्कि तुम्हे तो हमेशा रचनात्मक धर्म निभाते हुये लिखने से कभी मुंह नही मोड़ना चाहिये।"
"क्या लिखूं मैं?" वह भी खीजते हुये बोली, "क्या दुनिया में ऐसा कुछ हो रहा है जिसे लिखना चाहिये या जो कुछ हो रहा है वह लिखने के लायक है। एक तरफ़ तो तुम्हारे भाई बन्द लगातार तरक्क़ी की मंज़िलें तय करते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ वो इन्सानी क़द्रो क़ीमत के मामले में रसातल में जा रहें हैं। उनका ख़ून सफ़ेद हो चुका है। रिश्तों में दरारें हैं तो प्रेम की जगह नफ़रत ने ले ली है। धर्म को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और मुहब्ब्त को मतलबपरस्ती ने घेर रखा है। इतना कुछ तुम्हारी दुनिया में हो रहा है और तुम मुझसे कहते हो कि मैं लिखूं। बताओ क्या लिखूं मैं?"
"नही... नही...हालात इतने भी बुरे नही हैं।" मैंने फिर कहा, "तुम्हे भला कौन रोक सकता है कुछ भी कहने से। तुम मानवता की एक निरपक्ष, निडर, कर्मठ और आज़ाद योद्धा हो।"
"आज़ाद...? आज़ाद हूं मैं?" वह फिर भड़्की, "किस आज़ादी की बात करते हो? मेरी आज़ादी देखना चाहते हो तो जाओ तालीबानों, तानाशाहों, और पूंजीपतियों की दुनिया में, जहाँ मेरी बहनों के हाथ सिर्फ़ इसलिये काट दिये जाते हैं कि मुझे हाथ में लेकर वो अपना जीवन न सवांर सकें, आज़ादी की खुली हवा में सांस न ले सकें। वहाँ जाकर तुम्हें पता चलेगा कि मैं कितनी स्वतंत्र हूँ। वहाँ जब भी मैं चलती हूँ तलवार मेरी गर्दन पर होती है। वो जैसा चाहते हैं मुझे नचाते हैं और तुम कहते हो कि मैं आज़ाद हूँ।"
"मैं मानता हूँ कि विश्व के कुछ हिस्सों में तुमपर ज़ुल्म होता है।" मैंने दबी आवाज़ में कहा, "तुम्हारी चाल को तलवार की धार दिखा कर बदला जाता है परन्तु इस ग़ुलाम मानसिकता के बाहर तो आना ही होगा। भय त्यागना ही होगा वर्ना लोगों का भला क्योंकर हो पायेगा।"
"किन लोगों के भले की बात करते हो वो जो आज तक नही सुधरे।" वह एक बार फिर चिहुंकी, "जिन लोगों की बात तुम करते हो उनको सुधारने के लिये मैं ईमानदारी के साथ सदियों तक दौड़ी हूँ। क्या कुछ न लिखा मैंने तुम्हारे कहने पर। सुन्दर से सुन्दर शब्दों में पिरोकर तुम्हारे विचारों को मैंने इन लोगों के सामने रखा है।कभी रहबरों के साथ, कभी शायरों कवियों और लेखकों के साथ मिलकर इन्हें राह बताई मगर ये आज तक न सुधरे। आज भी वही अंधविश्वास, वही अनपढ़ता, वही ज़ाहिलपन फैला है जो सदियों पहले फैला था। अपने आपको शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोगों को भी मैंने गंवार और मजहबी जुनून से भरे देखा है। इन्सानियत को यूं मरते देखकर मेरे दिल की जो हालत होती है उसे तुम क्या जानो।" वह एकदम रोआंसी हो उठी।
"देखो दिल छोटा न करो "मैंने उसे दिलासा देते हुये कहा, "कभी पाँच उंगलियां भी बराबर होती हैं भला, परन्तु हर उंगली के महत्व से भी इन्कार तो नही किया जा सकता है। तुम अपना काम किये जाओ बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो। वैसे भी, ईश्वर ने ही तो तुम्हारा ये कर्तव्य निश्चित किया है कि जब तक दुनिया में इल्म का पूर्ण प्रकाश न फैल जाये, एक एक इन्सान शिक्षत और समझदार न हो जाये तुम्हे तो चलते ही जाना है क्योंकि चलना ही तेरी नियति है, चलना ही तेरा नियम है और चलना ही तेरा धर्म है।"
क़लम को अब कोई जवाब न सूझा। हालांकि उसके चेहरे पर अभी भी असंतुष्टि के भाव थे पर वह बोली कुछ नही।
"और सुनो" मैंने आगे कहा, "जीवन सिर्फ़ अपने लिये नही होता। अगर तुम्हारी तरह शेक्सपियर, गेटे, टाल्स्टाय, प्रेमचन्द, बच्चन, निराला और गुप्त भी सोचते तो साहित्य जगत युं न मालामाल होता और मानवता कबकी समाप्त हो चुकी होती। और रही बात आज़ादी की तो आज़ादी कोई बाहर ढूंढने की चीज़ नही, वह तुम्हारे अपने अंदर होती है। तुम्हारे मन, विचार कितने शुद्ध और स्वतंत्र हैं उसी का महत्व होता है। अंत में वही बात फिर एक बार मैं कहूंगा कि कर्म करते जाओ बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो।"
अब मुझे वह कुछ संतुष्ट व निरुत्तर नज़र आने लगी थी।
ख़ैर, काफ़ी सोच विचार के बाद अपने पुराने लिखे कागज़ों को एकत्रित कर एक ओर रखा और नये कागज़ सामने रखकर ज्योंहि कलम उठाकर उससे लिखने का प्रयास किया तो कलम अटकने लगी। उसके अटकने का कारण मुझे समझ में न आया। काफ़ी प्रयत्न करने पर भी जब वह टस से मस न हुई तो मैं खिन्न हो उठा और चलने के लिये कलम पर अधिक से अधिक दबाव डालने लगा। मेरा अत्यधिक दबाव देखकर यकायक कलम तड़प उठी और क्रोध से तमतमाते हुये मुझ पर उबल पड़ी।
"आख़िर क्या चाहते हो तुम मुझसे?" वह बिफरी ,"क्यों सताते रहते हो इस तरह मुझे आ आकर। हर सुबह मेरी गर्दन पकड़ कर अपनी मनमानी करना शुरू कर देते हो, आख़िर क्यों"
"ओह...हो.. ये क्या हो गया है आज तुम्हें" मैं बोला " क्यों इस तरह भड़क रही हो, मैने तुम्हे पहले कभी इस तरह अपने कर्तव्य से आंखे चुराते हुये नही देखा"
"कर्तव्य ? कौन से कर्तव्य की बात करते हो तुम" वह भड़क उठी "अगर तुम इमानदारी से सत्य लिखने को कर्तव्य मानते हो तो यह तुमने भी देखा है कि जब भी मैं ऐसा करने का प्रयास करती हूँ तो मेरे पैरों में बेड़ियां डालने की मुहिम शुरू हो जाती है और फिर ज्योंहि मेरे क़दम थमने लगते हैं तुम आकर फिर कर्तव्यपरायणता की दुहाई देने लग जाते हो।"
"यह तो तुम भी जानती हो प्रिये" मैने उसे समझाते हुये कहा, "जब भी दुनिया में कोई सत्य को अपनाता है और ईमान की राह पर चलने का प्रण करता है तो उसकी राह में अड़चनें तो आती ही हैं। फिर यह भी तो उचित नही कि सच्चाई से मुंह मोड़ो और जो होता है उसे होने दो"
"जो होता है उसे होने दो" उसने मेरी बात को व्यंग से दुहराते हुये कहा, "क्या तुम नही जानते कि इस दौर में ऐसा ही चाहा जाता है। हां में हां मिलाने की परिपाटी चली हुई है। राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि हर कोई चाहता है बस उसके गुण्गान किये जाओ। चमचागीरी और चापलूसी का ढंग अपनाये जाओ। उनके स्याह-सफ़ेद और घपले-घोटाले का हुबहू समर्थन किये जाओ और अगर ऐसा न कर सको तो अंजाम भुगतने के लिये तैयार हो जाओ।"
"तुम्हे इतनी नाकारत्मक सोच नही रखनी चाहिये" मैं लगभग खीजते हुये बोला, "बल्कि तुम्हे तो हमेशा रचनात्मक धर्म निभाते हुये लिखने से कभी मुंह नही मोड़ना चाहिये।"
"क्या लिखूं मैं?" वह भी खीजते हुये बोली, "क्या दुनिया में ऐसा कुछ हो रहा है जिसे लिखना चाहिये या जो कुछ हो रहा है वह लिखने के लायक है। एक तरफ़ तो तुम्हारे भाई बन्द लगातार तरक्क़ी की मंज़िलें तय करते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ वो इन्सानी क़द्रो क़ीमत के मामले में रसातल में जा रहें हैं। उनका ख़ून सफ़ेद हो चुका है। रिश्तों में दरारें हैं तो प्रेम की जगह नफ़रत ने ले ली है। धर्म को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और मुहब्ब्त को मतलबपरस्ती ने घेर रखा है। इतना कुछ तुम्हारी दुनिया में हो रहा है और तुम मुझसे कहते हो कि मैं लिखूं। बताओ क्या लिखूं मैं?"
"नही... नही...हालात इतने भी बुरे नही हैं।" मैंने फिर कहा, "तुम्हे भला कौन रोक सकता है कुछ भी कहने से। तुम मानवता की एक निरपक्ष, निडर, कर्मठ और आज़ाद योद्धा हो।"
"आज़ाद...? आज़ाद हूं मैं?" वह फिर भड़्की, "किस आज़ादी की बात करते हो? मेरी आज़ादी देखना चाहते हो तो जाओ तालीबानों, तानाशाहों, और पूंजीपतियों की दुनिया में, जहाँ मेरी बहनों के हाथ सिर्फ़ इसलिये काट दिये जाते हैं कि मुझे हाथ में लेकर वो अपना जीवन न सवांर सकें, आज़ादी की खुली हवा में सांस न ले सकें। वहाँ जाकर तुम्हें पता चलेगा कि मैं कितनी स्वतंत्र हूँ। वहाँ जब भी मैं चलती हूँ तलवार मेरी गर्दन पर होती है। वो जैसा चाहते हैं मुझे नचाते हैं और तुम कहते हो कि मैं आज़ाद हूँ।"
"मैं मानता हूँ कि विश्व के कुछ हिस्सों में तुमपर ज़ुल्म होता है।" मैंने दबी आवाज़ में कहा, "तुम्हारी चाल को तलवार की धार दिखा कर बदला जाता है परन्तु इस ग़ुलाम मानसिकता के बाहर तो आना ही होगा। भय त्यागना ही होगा वर्ना लोगों का भला क्योंकर हो पायेगा।"
"किन लोगों के भले की बात करते हो वो जो आज तक नही सुधरे।" वह एक बार फिर चिहुंकी, "जिन लोगों की बात तुम करते हो उनको सुधारने के लिये मैं ईमानदारी के साथ सदियों तक दौड़ी हूँ। क्या कुछ न लिखा मैंने तुम्हारे कहने पर। सुन्दर से सुन्दर शब्दों में पिरोकर तुम्हारे विचारों को मैंने इन लोगों के सामने रखा है।कभी रहबरों के साथ, कभी शायरों कवियों और लेखकों के साथ मिलकर इन्हें राह बताई मगर ये आज तक न सुधरे। आज भी वही अंधविश्वास, वही अनपढ़ता, वही ज़ाहिलपन फैला है जो सदियों पहले फैला था। अपने आपको शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोगों को भी मैंने गंवार और मजहबी जुनून से भरे देखा है। इन्सानियत को यूं मरते देखकर मेरे दिल की जो हालत होती है उसे तुम क्या जानो।" वह एकदम रोआंसी हो उठी।
"देखो दिल छोटा न करो "मैंने उसे दिलासा देते हुये कहा, "कभी पाँच उंगलियां भी बराबर होती हैं भला, परन्तु हर उंगली के महत्व से भी इन्कार तो नही किया जा सकता है। तुम अपना काम किये जाओ बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो। वैसे भी, ईश्वर ने ही तो तुम्हारा ये कर्तव्य निश्चित किया है कि जब तक दुनिया में इल्म का पूर्ण प्रकाश न फैल जाये, एक एक इन्सान शिक्षत और समझदार न हो जाये तुम्हे तो चलते ही जाना है क्योंकि चलना ही तेरी नियति है, चलना ही तेरा नियम है और चलना ही तेरा धर्म है।"
क़लम को अब कोई जवाब न सूझा। हालांकि उसके चेहरे पर अभी भी असंतुष्टि के भाव थे पर वह बोली कुछ नही।
"और सुनो" मैंने आगे कहा, "जीवन सिर्फ़ अपने लिये नही होता। अगर तुम्हारी तरह शेक्सपियर, गेटे, टाल्स्टाय, प्रेमचन्द, बच्चन, निराला और गुप्त भी सोचते तो साहित्य जगत युं न मालामाल होता और मानवता कबकी समाप्त हो चुकी होती। और रही बात आज़ादी की तो आज़ादी कोई बाहर ढूंढने की चीज़ नही, वह तुम्हारे अपने अंदर होती है। तुम्हारे मन, विचार कितने शुद्ध और स्वतंत्र हैं उसी का महत्व होता है। अंत में वही बात फिर एक बार मैं कहूंगा कि कर्म करते जाओ बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो।"
अब मुझे वह कुछ संतुष्ट व निरुत्तर नज़र आने लगी थी।
Thursday, January 15, 2009
कुछ पता नही चला
कब हुआ हादसा कुछ पता नही चला
दिल था या जुनून कुछ पता नही चला
मुहब्ब्त की बातें प्यार के हसीन पल
आये भी गये भी कुछ पता नही चला
शौक़ था हमें भी उनके दिल में रहने का
फिर क्यों हुये जुदा कुछ पता नही चला
भोली सूरत भोली आंखे भोला सा अंदाज़
क़त्ल कब हुआ मेरा कुछ पता नही चला
इश्क़े बादल बिन बरसे ही गुज़र गया
किसने की बेवफ़ाई कुछ पता नही चला
बदली आंखे तो बदल गया हर मौसम
क्यों बदला मेरा यार कुछ पता नही चला
कितने ही सवाल मेरी नज़रों में थे उठे
क्या था उनका जवाब कुछ पता नही चला
कुछ युं सहा हमने तीरे बेरुख़ी उनका
टपका है ख़ूने जिगर कुछ पता नही चला
कभी पागल, कभी दीवाना कहा निर्मल को
कौन था गुनाहगार कुछ पता नही चला
दिल था या जुनून कुछ पता नही चला
मुहब्ब्त की बातें प्यार के हसीन पल
आये भी गये भी कुछ पता नही चला
शौक़ था हमें भी उनके दिल में रहने का
फिर क्यों हुये जुदा कुछ पता नही चला
भोली सूरत भोली आंखे भोला सा अंदाज़
क़त्ल कब हुआ मेरा कुछ पता नही चला
इश्क़े बादल बिन बरसे ही गुज़र गया
किसने की बेवफ़ाई कुछ पता नही चला
बदली आंखे तो बदल गया हर मौसम
क्यों बदला मेरा यार कुछ पता नही चला
कितने ही सवाल मेरी नज़रों में थे उठे
क्या था उनका जवाब कुछ पता नही चला
कुछ युं सहा हमने तीरे बेरुख़ी उनका
टपका है ख़ूने जिगर कुछ पता नही चला
कभी पागल, कभी दीवाना कहा निर्मल को
कौन था गुनाहगार कुछ पता नही चला
बेवजह किसी को
बेवजह किसी को जलाना नही
जो जलता है उसे बुझाना नही
बिन बुलाये क़रीब जाना नही
जो आना न चाहे उसे बुलाना नही
लम्बी रेस अगर दौड़नी है तो
छोटी से कभी घबराना नही
सहज रहने की आदत डालो
बेसब्र होके कुछ गंवाना नही
अपने दिल की ही सुनो फ़कत
इधर उधर युं ही जाना नही
मुश्किलें कहाँ नही होती निर्मल
उनके डर से भाग जाना नही
जो जलता है उसे बुझाना नही
बिन बुलाये क़रीब जाना नही
जो आना न चाहे उसे बुलाना नही
लम्बी रेस अगर दौड़नी है तो
छोटी से कभी घबराना नही
सहज रहने की आदत डालो
बेसब्र होके कुछ गंवाना नही
अपने दिल की ही सुनो फ़कत
इधर उधर युं ही जाना नही
मुश्किलें कहाँ नही होती निर्मल
उनके डर से भाग जाना नही
तकनीकी विद्या
ख़त्म हुआ है दौर ख़तों का
चला दौर अब ई-मेलों का
लगता नही पता ज़रा भी इन
भ्रमित अन्तर्जाली खेलों का
क्या-क्या हासिल नही है भाई
अन्तर्जाल की माया नगरी में
यूं लगता है सचमुच जैसे
हो भरा समन्दर गगरी में
जो तुम चाहो उसको लेने
बेहिचक अन्तर्जाल पे जाओ
कहीं न जाना, कहीं न आना
बैठे-बैठे शापिंग कर जाओ
नही ज़रूरत किसी दोस्त की
न ही ज़रूरत बैठकबाज़ी की
चाहिये केवल इक कम्प्यूटर
अपेक्षा नही कबूतरबाज़ी की
अगर बड़ों की अपनी है तो
छोटों की अपनी है साईट
हर उम्र को मिलती पूरी ख़ुशी
है जो सबका अपना राईट
तकनीकी विद्या की जीवन में
होती एक विशेष महत्ता
नेत्र तीसरा है ये कहलाती
पास है जिसके, उसकी सत्ता
सीख लो तुम भी जल्द इसे
वर्ना देर बहुत हो जायेगी
रह जाओगे तुम पीछे और
दुनिया आगे बढ़ जायेगी...
चला दौर अब ई-मेलों का
लगता नही पता ज़रा भी इन
भ्रमित अन्तर्जाली खेलों का
क्या-क्या हासिल नही है भाई
अन्तर्जाल की माया नगरी में
यूं लगता है सचमुच जैसे
हो भरा समन्दर गगरी में
जो तुम चाहो उसको लेने
बेहिचक अन्तर्जाल पे जाओ
कहीं न जाना, कहीं न आना
बैठे-बैठे शापिंग कर जाओ
नही ज़रूरत किसी दोस्त की
न ही ज़रूरत बैठकबाज़ी की
चाहिये केवल इक कम्प्यूटर
अपेक्षा नही कबूतरबाज़ी की
अगर बड़ों की अपनी है तो
छोटों की अपनी है साईट
हर उम्र को मिलती पूरी ख़ुशी
है जो सबका अपना राईट
तकनीकी विद्या की जीवन में
होती एक विशेष महत्ता
नेत्र तीसरा है ये कहलाती
पास है जिसके, उसकी सत्ता
सीख लो तुम भी जल्द इसे
वर्ना देर बहुत हो जायेगी
रह जाओगे तुम पीछे और
दुनिया आगे बढ़ जायेगी...
Wednesday, January 14, 2009
रिश्ते जो रिस ते हैं
रिश्ते
जो रिस ते हैं
दर्द की इन्तहा से होकर
पल-पल गुज़रते हैं,
नीर बनके नयनों से
जब-तब निकलते हैं,
जीवन की धड़कनों में
घुन जैसे बसते हैं
रिश्ते
जो रिस ते हैं...
रिश्ते
जो रिस ते हैं
आकाश की देन हों
या पृथ्वी का उपहार,
जाने क्यों करते हैं
मन की दुनिया का संहार,
न जोड़े जाते हैं
न तोड़े जाते हैं,
न बताये जाते हैं
न छुपाये जाते हैं,
सम्बन्धों की चक्की में
हरदम पिसते हैं,
रिश्ते
जो रिस ते हैं...
रिश्ते
जो रिस ते हैं
उन पर
मुस्कानों का
लेप किया जाता है,
समय की औषधि से
उपचार किया जाता है,
समझौतों का
अमृत चखाया जाता है,
अनगिनत
प्रार्थनाओं का
अर्घ चढ़ाया जाता है,
मगर
बावले हैं वो
बमुश्किल ही
संभलते हैं,
रिश्ते
जो
रिस ते हैं...
जो रिस ते हैं
दर्द की इन्तहा से होकर
पल-पल गुज़रते हैं,
नीर बनके नयनों से
जब-तब निकलते हैं,
जीवन की धड़कनों में
घुन जैसे बसते हैं
रिश्ते
जो रिस ते हैं...
रिश्ते
जो रिस ते हैं
आकाश की देन हों
या पृथ्वी का उपहार,
जाने क्यों करते हैं
मन की दुनिया का संहार,
न जोड़े जाते हैं
न तोड़े जाते हैं,
न बताये जाते हैं
न छुपाये जाते हैं,
सम्बन्धों की चक्की में
हरदम पिसते हैं,
रिश्ते
जो रिस ते हैं...
रिश्ते
जो रिस ते हैं
उन पर
मुस्कानों का
लेप किया जाता है,
समय की औषधि से
उपचार किया जाता है,
समझौतों का
अमृत चखाया जाता है,
अनगिनत
प्रार्थनाओं का
अर्घ चढ़ाया जाता है,
मगर
बावले हैं वो
बमुश्किल ही
संभलते हैं,
रिश्ते
जो
रिस ते हैं...
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